hari singh nalwa

Sardar Hari Singh Nalwa Story in Hindi

सरदार हरि सिंह नलवा

Sardar Hari Singh Nalwa Story in Hindi-दोस्तों भारत वीरो की धरती है भारत की धरती समय समय पर ऐसे ही वीरो को जन्म देती रही है |आज हम आपको बताने जा रहे है एक ऐसे ही सरदार की कहानी जो सिर्फ नाम से ही सरदार नहीं थे |जिनके नाम के साथ शेर को जोड़ा जाता है|

जिन्होंने अफगानिस्तान तक परचम लहराया था |जिनके विजय रथ को रोकना असंभव सा हो गया था |जिनके नाम मात्र से ही बड़े बड़े सूरमे मैदान छोड़ कर भाग जाते थे |ऐसे वीर सूरमा जिसने अफगान की धरती पर राज किया |जिनका नाम है जरनैल हरी सिंह नलवा जी   –

जब संसार में सबसे बड़े और कामयाब जरनैल  की बात आती है तब एक नाम ही  आता है हरी सिंह नलवा ,जिनका जन्म 28 अप्रैल 1791 में गुजरावाले  गाँव ,सरदार गुरदयाल सिंह और माता धर्म कौर के घर हुआ था |जब हरी सिंह नलवा 7 वर्ष के थे तो पिता का साथ खो चुके थे उन्हें उनकी माँ ने ही नानके पिंड (नाना के घर )पाला|

पंजाबी फारसी का ज्ञान उन्हें वही मिला ,साथ ही साथ उन्हें घुड़सवारी और तीरंदाजी की शिक्षा वही मिली 7-8 वर्ष की शिक्षा लेने के बाद जब हरी   सिंह 14  वर्ष के हो गये थे |

शेर-ए -पंजाब (महाराजा रणजीत सिंह )जी अपने दरबार में योधाओ की शक्ति पर्दर्शन के लिए बसंत पंचमी के दिन बसंती  दरबार(मेला ) सजवाया करते थे |जहा आकर बड़े बड़े योधा अपनी शक्तियों का पर्दर्शन और युद्ध कौशलता का करतब दिखाया करते थे |

1805 ईसवी में जब दरबार सजा था दूर दूर से आये योद्धा अपना करतब दिखा रहे थे तब एक 14 वर्ष का ऊचा लम्बे शारीर का मालिक मैदान में आता है और अपनी सस्त्र विद्या के वो करतब करके दिखाता है, जो आज से पहले कभी किसी योधा ने नहीं देखे थे |

शेर-ए -पंजाब यह सब देख कर बहुत खुश हुए और उसी समय इस बचे को महाराज के सामने पेश किया गया |जोहरी को ही असली हीरे की पहचान होती है |महाराज से परिचय करके बच्चे का नाम पता चला हरी सिंह है महाराज ने खुश होकर अपने गले से बेशकीमती हार निकाल कर हरी सिंह को दे दिया |

उन्हें अपना खास खिदमत कार बनया और  अपनी फ़ौज मै भर्ती किया इस तरह हरी सिंह नलवा महाराजा रणजीत सिंह से मिले |

हरी सिंह से हरी सिंह नलवा बनने की कहानी –

महाराजा रणजीत सिंह हरी सिंह और कुछ और सनिको के साथ शिकार खेलने जा रहे थे |तब हरी सिंह की उम्र 15 बर्ष थी| जब जा रहे थे तबी एक विशाल शेर ने हरी सिंह के ऊपर झपट्टा मारा हरी सिंह ने थोडा संभलते हुए उस शेर के मुह को पकड़ लिया |

जब शेर अपने जबड़े को फैला कर उन पर वार कर रहा था तबी उन्होंने अपने दोनों हाथो से उस शेर के दोनों जबड़ो को पकड़ कर इतनी जोर से खीचा शेर को चीर कर रख दिया ,यह काम उन्होंने बिना किसी शस्त्र के किया इसलिए उन्हें शेर दिल के नाम से जाने जाना लगा और बिना किसी शस्त्र के शेर को मारने के कारण नलवा उनके नाम से जुड़ गया |

महाराज रणजीत सिंह के सेना नायक-

महाराजा रणजीत सिंह ने  उनकी ये बहादुरी देख कर  उन्हें  बेशकीमती इनाम और 800 घुड़सवार सैनिको की कमान दे दी गयी कमान सँभालने के बाद सरदार हरी सिंह नलवा ने उन मुल्खो को जीतना शुरु किया जहा पर  क्रूर शासको का राज था |जो अत्याचार करते थे हिन्दू परिवारों और गरीबो के साथ |

महाराजा रणजीत सिंह की अगुवाई में सरदार हरी सिंह नलवा ने तिवाने ,सज्जद ,खखे ,बब्बे ,खैबर दर्रे,गुज्जर ,कश्मीर,काबुल  तक फ़तेह की उन्होंने 1813 में अटक, 1818 में मुल्तान, 1819 में कश्मीर तथा 1823  में पेशावर की जीत में विशेष योगदान दिया और सिख राज में मिला लिया । अत 1824  तक कश्मीर, मुल्तान और पेशावर पर महाराजा रणजीत सिंह का आधिपत्य कर  इन्हें सिख राज में मिला दिया |

कुछ समय बाद उनकी सेना को बाघ मार (शेर मारने वाले )नाम से जाने जाना लगा था  |सरदार हरी सिंह नलवा ने खैबर दर्रे पर भी फ़तेह हासिल की | खैबर दर्रे एक ऐसी जगह थी जहा से भारत पर कई बार आक्रमण हुआ था ,  इसी रस्ते से ही सारे हमले हुआ करते थे इसलिए उस जगह को फ़तेह कर  सरदार हरी सिंह नलवा ने उस जगह को अपने कब्जे में लेकर जमरूद में मजबूत  किले का निर्माण करवाया जहा वो अपनी सेना रखते थे, ताकि फिर  कभी वहा से आक्रमण ना हो |

सरदार हरी सिंह नलवा ने भारत पर होने वाले आक्रमण के मुख्य रस्ते को  बंद कर दिया था |और इतिहास गवाह  है तब से आजतक उस रास्ते से भारत पर कभी आक्रमण नहीं हुआ| उस वक़्त सरदार हरी सिंह नलवा का नाम इतना मशहूर हो गया था की अगर युद्ध मै हरी सिंह नलवा खुद आ जाते तो पठान सेनाये  मैदान छोड़ कर भाग जाया करती उनके चेहरे के नूर मै इतनी शक्ति थी की दुश्मन उन्हें देख कर ही डर जाया करते |

सरदार हरी सिंह नलवा ने बड़ी बड़ी सेनाओ से युद्ध किये उन्होंने कसोर, सियार कोट ,मुल्तान, पेशावर,जमरूद ,अटलोक,की लड़ाई लड़ी और फ़तेह की|

 

सरदार हरी सिंह नलवा की शहीदी –

1837 में महा राजा रणजीत सिंह अपने बेटे की शादी में व्यस्त थे और इस वजह से ज्यादा तर फ़ौज उनके बेटे की शादी में शामिल होने के लिए गयी हुई थी इस मौके का फ़ायदा उठा कर अफगान फ़ौज ने जमरूद किले पर 28 अप्रैल 1837 को आक्रमण कर दिया |उस समय महा सिंह जी के पास इस किले की जिमेदारी थी |

अफगान फ़ौज की संख्या 14 से 15 हज़ार थी और जमरूद किले के अन्दर सिखो की संख्या 700 से 800 थी |पठान सेना जमरूद किले पर कब्ज़ा करना चाहती थी |सरदार हरी सिंह नलवा उस समय पेशवर में थे जो काफी बीमार चल रहे थे|पेशेवर से जमरूद किले की दुरी 12 मील है |

दोस्त महोमद जो अफगान सेना का जरनैल था अपने पुत्र अकबर खां और शमी खां के साथ मिलकर किले की एक दिवार को तोड़ने का फैसला लिया  उन्होंने  किले की एक दिवार पर तोपों से  हमला कर करके दिवार को  दिया था |परन्तु रात होने की वजह से लड़ाई बंद कर दी गयी |सरदार हरी सिंह नलवा तक हमले की  बात पहुचनी बहुत जरुरी थी |इसलिए एक चिठ्ठी लिखी गयी जिसे बीबी हरशरण कौर जी खुद ले कर रात में ही  सरदार  हरी सिंह नलवा तक  पहुची |

सारी बात पता चलने पर सरदार हरी सिंह नलवा कुछ सैनको के साथ जमरूद पहुचे |सुबह हो गयी थी अभी अफगानी सेना उठी थी तभी उस सेना पर हमला कर दिया गया |अफगान सेना में हाहाकार मच गयी की हरी सिंह नलवा आ गया शेरमार आ गया |पठान भाग खड़े हुए सारी सेना भाग गयी |

सरदार हरी सिंह नलवा के एक साथी जिनका नाम भाई निदान सिंह था| वह काफी आगे निकल गये सेना के पीछे यह देख सरदार हरी सिंह नलवा  भी उनके पीछे इसलिए चले गये की कही आगे जाके भाई निदान सिंह अकेले ना पड़ गये हो |वह उनके  जा ही रहे थे वहा पर कुछ पठानी फोजी छिप कर बेठे थे |

उन्होंने सरदार हरी सिंह नलवा को अपनी तरफ आता देख गोलियों की बारिश कर दी |जिसमे से 1 गोली उनकी छाती पर और दूसरी गोली पेट पर जा लगी |उनका घोडा जिसने हर लड़ाई में उनका साथ दिया था वह उन्हें वापिस ले आया |गोलिया निकल दी गयी पर काफी जख्मी होने की वजह से वह शहीद हो गये |

शहीद होने से पहले उन्होंने अपनी मौत की खबर गुप्त रखने के लिए खा था |जिसकी वजह से पठान सेनिको ने 7 दिन सरदार हरी सिंह नलवा के डर के कारण हमला नहीं किया |इन 7 दिनों में सिखो की बहुत सारी फोज जमरूद पहुच चुकी थी जिसके कारण उन्होंने यह जंग भी फ़तेह कर ली |

सरदार हरी सिंह नलवा ही ऐसे योधा थे| जिन्होंने अफगानिस्तान पर भी हुकूमत की थी |जहा अभी तक अमेरिका और अन्य देशो को कब्ज़ा लेने के लिए इतना जूझना पढ़ रहा है |ऐसे थे महान वीर जरनैल हरी सिंह नलवा ..

Share

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

loading...